रेल की यात्रा
रेल की यात्रा मुझे हमेशा पसन्द रही है । विशेष तौर पर खिड़की पर बैठ कर बाहर के दृश्यों को देखना मुझे हमेशा रोमांचित करता है ।बचपन मे छुट्टियो मे अक्सर हम अयोध्या की यात्रा करते थे ।उस जमाने में कोयला वाले इंजन चला करते थे ।में तब भी खिड़की पर बैठता था तब इसका खामियाजा भी भोगता था।आंखों में कोयला घुस जाता और मलते मलते परेशान हो जाता ।अम्मा अलग परेशन होती ।अन्ना अलग डांट लगाते ।परिणाम मुझे सुला दिया जाता ताकि सवेरे आंखे ठीक से खुल सके ।इतना सब कुछ होने के बावजूद मै खिड़की पर बैठने का प्रलोभन त्याग नही पाया और जब भी मौका मिला मेने खिड़की के पास ही बैठ कर यात्रा की है ।
अब तो जमान बदल गया है कोयले की जगह बिजली वाले इंजन आ गए ।टिकट के लिए लाइन नही लगानी पड़ती ।सोने और बेठने के लिये बर्थ आरक्षित हो जाती है और अब आराम से सोते हुए यात्रा कर सकते है ।लेकिन इन सारी सुविधाओ के होने के बावजूद में खिडकी से बाहर झाकना छोड नही पाता हूँ और जब भी यात्रा का मौक़ा मिलता है में खिडकी के पास जरूर बैठता हूँ ।
खिड़की से दीखते हुए द्र्श्य मुझे हमेशा आंदोलित करते है ।बदलते परिदृश्य ,बदलती भाषा ,बदलते लोग हड़बड़ी में भागते यात्री ।चाय समोसे की आवाज लगते हॉकर, उदासीन भाव से रेल को देखते वे लोग जो सवेरे सवेरे प्लेटफॉर्म पर घूमने आ जाते ।यह सब देखना अच्छा लगता है और इन सभी दृश्यों को में अपने ह्रदय में अपने मन मे समेटना चाहता हूं । यात्रा के यह दृश्य मेरे लिए आनंद दायक होते है और काफी दिनों तक मे इसमे डूबता उतरता रहता हूँ ।
में अब बुड्ढा हो गया हूँ ।अब शरीर मे उतनी उर्जा नही रही ।यात्रा करना भी जोखिम भरा हो गया है ।लेकिन जब कई साल बाद मुझे सतना से आगरा की रेल यात्रा करनी पड़ी तो पुरानी यादें ताजा हो गयी ।
रात दस बजे महाकोशल से हम अपने आरक्षित डिब्बे मे बेठे । कुक्कु हमे छोड़ने आया था ।जाड़ा खूब पड़ रहा था ।यद्यपि हम गर्म कपड़ों से लदे पड़े थे और ऊपर से कम्बल भी औड़ रखा था । लेकिन खिड़की के पास बैठ कर बाहर देखने का प्रलोभन नही त्याग पाया ।मेने खिड़की खोली ही थी कि प्रीति ने कहा -खिड़की मत खोलना चुपचाप सो जाओ । मेने उसकी बात मान ली मगर शीशे वाली खिड़की से बाहर झाकन बन्द नही किया और जब तक नींद नही आई मैंने खिड़की से झांकना छोड़ा नही ।
रात काफी हो चुकी थी ।सारे सहयात्री कम्बल तान चुके थे ।प्रीति भी सो चुकी थी औऱ अब खिड़की के बाहर भी सिर्फ अंधेरा था ।मेरी आँखों मे भी नींद भर आयी थी ।रात के बारह बज चुके थे और चारो और सन्नाटा पसर चुका था ।पटरियों पर दौड़ती रेल के पहियों की आवाज - खट खटा खट खट मधुर संगेटसा लग रहा था और इसकी संगत करते हुए कब नींद के आगोश में चल गया पता ही नही चला ।जब आंख खुली तो रेल कही खड़ी थी ।चारो और ख़ामोशी थी ।लोगो की तरह तरह के खुर्राटो के बीच मेने खिडकी से झाक कर देखा ।किसी जंगल मे खामोशी से रेल खड़ी थी ।मेने काफी देर तक अपनी आंखें खोली रखी तब तक इंजन खामोश ही राह ।अभी रात बाक़ी थी ।लोग गहरी नींद में थे ।डब्बे की लाइटे बंद थी मेने भी औरो की तरह फिर सोने का प्रयास किया तभी इंजन ने सिटी मारी और चरमराते हुए पहिये पटरी पर दौड़ने लगे।
फिर वही संगीत गूंजने लगा और में एक बार फिर निदिया रानी की गोद मे चला गया
अबकी बार मेरी नींद टूटी तो कोई स्टेशन आ गया था ।मेने खिड़की से झाँक कर देखा तो झांसी स्टेशन था ।मेने घड़ी में टाइम देखा तो सवेर के 5 बजे थे ।सारा स्टेशन सोया हुआ था ।डिब्बे के अंदर भी कुछ ऐसा ही दृश्य था ।मुझे जोरो की शंका लगी थी सो में जल्दी जल्दी स्थान पर पहुंचा मगर सारे स्थान हाउसफुल थे ।थोड़ा इंतजार करना पड़ा और फिर में चेन से बैठ कर समाधान कर रहा था ।रेल चल पड़ी थी और फिर पहियों की खट खटाक के साथ मे पूर्ण आनंद में मग्न था ।
अपने बर्थ पर जब में पहुंच तो मन और शरीर से प्रसन्न था ।अब में पूरी तरह से ऊर्जावान था नुन्द पूरी हो चुकी थी और डिब्बे के बाहर सूर्य देवता दिखाई देने लगे थे ।अब बाहर काफी रोशनी थी और बाहर के दृश्य दिखाई देने लगे थे ।अब रेल भी अपनी गति से अच्छी चल रही थी ।हमारा डिब्बा भी जाग चुका था ।यद्यपि गाड़ी देरी से चल रही थी मगर किसी को कोई शिकायत नही थी ।सब अपने अपने हिसाब से अपना स्टेशन आने का इंतजार कर रहे थे ।
अगला बड़ा स्टेशन ग्वालियर था जहां ज्यादातर यात्री उतरने वाले थे ।धूप निकल आयी थी और मौसम भी थोड़ा गर्म हो चुका था ।ट्रेन में चाय बेचने वाले चाय चाय की आवाज लगाने लगे थे ।मुझे भूख भी लग रही थी ।प्रीति ने कहा कि ग्वालियर में कुछ खाएंगे और फिर चाय पियेंगे ।
ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी ।मेने खिडकी पूरी तरह से खोल ली और बाहर के दृश्यों का आनंद लेने लगा ।मुझे बाहर के दृश्य अच्छे लग रहे थे ।खेत तालाब बगीचे, रेल के साथ दौड़ लगती बस मोटर गाड़ी ,बाहरी बस्ती के दृश्य , तो कभी विपरीत दिशा से गुजरती दूसरी रेलगाड़ी अजीब रोमांच पैदा कर रहे थे ।मे पूरी तरह इसमे डूब गया और पता ही नही चला कि हम कब ग्वालियर पहुंच गए ।
ग्वालियर आ चुका था रेल के डिब्बे ब्रेक लगाने से जोरो से चीखे और फिर शांत हो गए ।रेल रुकते ही सरे स्टेशन में हलचल मच गई ।चाय समोसे पूरी सब्जी की आवाजें गुजाने लगी ।यात्री आराम से उतरने लगे ।प्रीति ने कचोरी खरीदी और मुझे दी कहा - यह अच्छी है खा सकते हो । मुझे कचोरी अच्छी लगी शायद इसलिए कि पेट पूरी तरह खाली था ।कचोरी खत्म हुई तो चाय हाजिर थी ।चाय पीकर थोड़ी प्रसन्नता हुई ।अब आगरा ज्यादा दूर नही था
रेल चल पड़ी थी । में बाहर के दृश्य देखने मे मग्न हो गया ।तभी मेरा मोबाइल घनघनाने लगा ।।राजा को फोन था ।पूछने लगा कि कहां हो ।मैने कहा ग्वालियर से चल पड़ा हूँ ।उसने कहा ठीक है और फोन कट गया ।में कुछ सोचता रहा और फिर खिड़की से बाहर झांकने लगा ।ट्रेन किसी नदी के उपर से गुजर रही थी अचानक मेरे मन में आया कि मेरे पास तो स्मार्ट फ़ोन हे क्यो ना खिड़की से बाहर के दृश्यों को रिकॉर्ड कर लूं ।फिर मेने यही किया मैं खिड़की से बाहर और कभी डिब्बे के अंदर कि हलचल को रिकॉर्ड करने लगा ।मुझे बड़ा ही आनंद आने लग ।में रिकॉर्डिंग में इतना व्यस्त हो गया कि पता ही नही चला कब सैयां आ गया ।प्रीति ने कहा -अब आगरा आने वाला है सारा सामान पैक कर लो ।मेने मोबाइल अपनी जेब मे रखा और सामान पैक कर लिया ।प्रीति ने फिर कहा -दरवाजे के पास चलते है ताकि आराम से उतर जाए ।हमने ऐसा ही किया और रेल रुकने पर आराम से प्लेटफार्म पर उतर गए ।अब हम आगरा में थे जहां के चप्पे चप्पे से हम परिचित थे ।यात्रा बिना किसी कठिनाई और घटना के संपन्न हो गयी इस बात की बहुत खुशी थी
आगरे की सड़क पर ई रिक्शा में बैठ कर घर जाते हुए मै सौच रहा था कि अब घर पहुंच कर पलंग पर कम्बल तान कर चेन से सोऊंगा ।मुझे बड़ी जोर के ठंड लगने लगी थी ।

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