रिश्वत कांड
रिशवत कांड मे मेरा नाम क्याआ गया मै पूरी तरह से बदनाम हो गया। अखबार मे काण्ड छपा तो पूरा शहर जान गया की सक्सेना बाबू रिशवत लेते पकड़े गये। मोहल्ले मे सर उठा कर चलना हराम हो गया। घरवालों के अलग मुँह फूल गये। भाई लोग कहने लगे -दादा तुम तो बड़े चालू बनते थे कैसे दाँव खा गये। दुश्मन खुसी मनाने मे लग गये मिठाईया बटने लगी। जुगाड़ू जुगाड़ लगाने मे लग गये कि कैसे सक्सेना बाबू की मलाईदार सीट हथियाई जाये।मै अकेला पढ गया। सब मेरे साये से दूर भागने लगे माँनो मुझे कोई छूत की बीमारी लग गयी है। एसे मे सिर्फ साहब ही ेसे थे जिन्होने सहानुभूति दिखते हुए कहा -सक्सेना फ़िक्र मत करो अभी मामला गरम है सो तुम्हे निलंबित तो करना पड़ेगा लेकिन मामला ठंडा होते ही तुम्हे बहाल कर दूंगा यह मेरा वादा है। मुझे साहब पर पूरा विश्वाश था आखिर आधी मलाई तो में उन्हे ही तो देता था। साहब बोले -तुम एसा करो यह शहर छोड़ दो और मजे से अपना वक्त काटो तुम्हे अस्सी प्रतिशत तनखा तो मिलेगी ही तो क्या फ़िक्र है। बात तो सच थी लेकिन मै कहाँ जाता। लक्ष्मी के चक्कर मे तो मैने सारे रिश्ते नाते ताक पर रख दिये कोन मुझे पूछता ?वैसे भी मै इस बात से चिंतित था की अब सूखी तनखा मे ही गुजारा करना पड़ेगा। वो जो फ़ोकट मे रबड़ी मलाई और समोसे खाने को मिलते थे अब नहीं मिलेगे। यह भी चिंता थी की कहाँ जाउँ। मोहल्ले वालो से नजर चुराना पड़ता और घरवाले चैन नहीं लेने देते। बच्चो ने सलाह दी -पापा समशान घाट ठीक रहेगा। बच्चो ने तो मजाक मे कही मगर मुझे जम गया। अंततः मैने फैसला किया की सवेरे सवेरे शमशान घाट निकल जाऊँगा और रात अंधेरे वापस आऊंगा। घरवाली ने भी समर्थन कर दिया और दूसरे दिन ही मुँह अंधेरे मुझे झोला और टिफिन देकर रवाना कर दिया।
मै शमशान घाट पंहुचा तो वहां हलचल वाली शांति थी। मुरदे शांति पूर्वक आ रहे थे और शांति से जल रहे थे। लोग रोते चिल्लाते आते और मुस्कुराते हुए चले जाते -चलो मुक्ति मिली। मुझे अपने लिये स्थान की तलाश थी सो मुझे मिल गया। वहाँ एक पीपल का पेड़ था थोड़ी उचाई पर एक चबूतरा सा बना हुआ था। पास ही नदी बह रही थी। एकांत और शांत स्थान था। वहां से शमशान घाट की पूरी हलचल दिखाई देती थी और मुझे कोई डिस्टर्ब भी नहीं करता । मुझे वहां कोई नहीं जानता था सो मेरा दिल चैन से था और मुझे बस वक्त काटना था।
मेरा वक्त ठीक से कट रहा था। दोपहर हो चुकी थी भूख लगाने लगी मैने टिफिन निकाला। घरवाली ने सुखी रोटी और सब्जी रखीं थी। यह देखकर मन उदास होगया। दफ्तर के समोसे और कचौड़ी याद आने लगे। मन मार कर खाने लगा तभी एक काले रंग का मोटा तगड़ा कुत्ता आकर घूरने लगा। एसा लगा मानो कह रहा हो अकेले अकेले। मै समझ गया की यहाँ रहना है तो इसे भी हिस्सा देना पड़ेगा। मैने एक रोटी उसे दे दी तो वह पूछा हिलाने लगा यानी वो मेरा हिस्सेदार दोस्त बन गया।खाना खा लिया तो नीद आने लगी। मैने अपना झोला वही पीपल के पेड़ पर टांगा और खुर्राटे भरने लगा। जब मेरी आँख खुली तो अंधेरा हो चूका था.शमशान मे चारो तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था चिताये चट चट कर जल रही थी चिताओ के पास खड़े लोगो की छाया प्रेत जैसी लग रही थी। मैने अपना झोला उठाया और सीधे घर की और चल दिया।
अब मेरी यही दिनचर्या थी। सवेरे मुँह अंधेरे उठ कर यहाँ आता और रात अंधेरा होते ही चला जाता। पीपल के पेड़ के नीचे मेरा मन रम गया। अब मेरे साथ लच मे बहुत सारे हिस्सेदार हो गये थे। वे सब हट्टे कट्टे थे। दरअसल मरे हुए लोगो के लिये जो खाना लोग रख जाते थे वे उसे खा खा कर मोटे तगड़े हो गये थे और पक्का खाना खा खा कर ऊब चुके थे इसलिये मेरी सुखी रोटी मे भी उन्हे स्वाद आने लगा था। मुझे इससे क्या फर्क पड़ता था। फिलहाल यहाँ मेरे लिये न तो कोई समस्या थी और ना ही कोई चिंता। मै मस्ती से अपने दिन काट रहा था..शमशान मे तरह तरह की लाशे आती। अच्छे लोगो की तो बुरे लोगो की। चोर बदमाश लुटेरे बलात्कारी ठग जेबकतरी की लाशे आती तो धन्ना सेठ भिखारियों की भी। नेताजी भी आते तो नौटंकी वाले भी आते। .मै अपने चबूतरे से सबका हाल देखता ज्यादा उत्सुकुता होती तो पास जाकर उन्हे देखता। अकसर उनकी मनोदशा के बारे मे सोचा करता कि ये कद्दावर लोग जिन्दा रहते तो नाक पर मक्खिया भी नहीं बैठने देते होंगे और आज जमींन पर औंधे मुँह पड़े है। लोग जलाने की तैयारी कर रहे है ।
शमशान अब मेरा घर था और मै अक्सर इसके चक्कर काटता रहता था। ज्यादातर समय तो अब मेरा पीपल के पेड़ के नीचे ही चितन मनन मे ही कटता था और बस एसे ही मुर्दो का ध्यान करता रहता था । एसे ध्यान करते करते कब मेरे पास मुर्दो से बात करने की शक्ति आ गयी मुझे पता ही नहीं चला। हुआ यू कि एक दिन कुछ लोग एक लाश लेकर आये और एक तरफ पटक कर आपस मे बात करने लगे। उनकी बाते सुनकर मेरा ध्यान उनकी और चला गया। एक बोला -यह बुड्ढा तो बड़ा हरामी था। जीते जी तो इसने हमे फूटी कोड़ी नहीं दी अब इसके क्रिया करम का क्या करे। दूसरा बोला -लोक समाज के लिये लाश तो यहाँ ले आये है लेकिन एसा करते है की इसे नदी मे फेंक देते है या यही छोड़ जाते है। बाकि दोनों इस बात से राजी नहीं हुए बोले -कभी कभी लाशे जिन्दा हो जाती है इसलिये इसे फूँक फाँक कर किस्सा ही ख़तम करते है। फिर चारो ने मुंडी हिलायी और कहा थोड़ी लकड़ी ले आते है बाकी पेट्रोल छिड़क कर इसे फूंक देते है बाकी कौन से क्रिया कर्म करने है।वे लोग चले गये तो मेरा ध्यान मुर्दे की और गया। पता नहीं क्यों मुझे लगा की मुर्दा मुझे बुला रहा है। मैने आंखे मली कि मुझे कोई भ्रम तो नहीं हो रहा है लेकिन सच था की मुरदा मुझे बुला रहा था।
मै लपक कर उसके पास पंहुचा तो वह बोला -सक्सेना बाबू मेरी मदद करो। मैने कहा -मदद कैसी मदद ? मुर्दा बोला -ये मेरे नालायक लड़के है। मै भी सरकारी बाबू था। मैने भी खूब दौलत कमाई लेकिन इन लोगो को फूटी कोड़ी नहीं दी क्योकि मुझे मालुम था ये उसे बर्बाद कर देंगे। मरने से पहले मैने क्रिया करम के लिये लाख रुपये रख दिये थे। अब मरने के बाद इन लोगो ने रुपये तो अपने पास रख लिये और मेरी बेकदरी करने की तैयारी मे है। मैने कहा -तो मै इसमे क्या कर सकता हूँ। मुर्दा बोला तुम जुगाड़ लगाओ तुम बहुत कुछ कर सकते हो।मेरी तो बस इतनी मदद करो की यह मेरा क्रिया करम तो सही तरह से करे बाकी दौलत से मुझे कुछ लेना देना नहीं है।.मै सोचने लगा तभी मेरे मन का बाबू जाग उठा -मैने कहा ठीक है मै तुम्हारी मदद करता हूँ लेकिन मुझे क्या फ़ायदा ?मुरदा बोला -मेरे लड़के मुर्ख लालची और डरपोक है तुम चालू आदमी हो सौदा पटा सकते हो । मै सोचने लगा। मैने कहा-- तुम अपनी सारी डिटेल बताओ। मुर्दा बोला -तुम मेरे सर पर हाथ रखो मेरे दिमाग की सारी फाइले तुम्हारे दिमाग मे कॉपी हो जायेंगी।मैने एसा ही किया और सचमुच उसकी सारी बाते मुझे मालुम पढ़ गयी.तभी अचानक उसके लड़के आ गये।मुझे लाश के पास खड़े देखकर बोले -अरे कौन हो तुम ? और लाश के पास क्या कर रहे हो। मैने भी कड़क आवाज मे कहा -मै यह देख रहा हूँ की इस लाश की बेकदरी हो रही है ठीक से संस्कार नहीं हो रहे। वे गुस्से मे बोले -तुम कोन होते हो यह हमारा बाप है हम जैसा चाहे वैसा करे। मेने कहा -अरे वाह तो तुम बिना संस्कार के सारी दौलत एसे ही हड़पना चाहते हो। वे बोले कैसी दौलत। मेने कहा -जो यह घूरेलाल तुम्हारा बाप छोड़ गया है। मैने यह भी कहा -ये अपने क्रिया करम के लिये लाख रुपये छोड़ गया था वो तुमने आपस मे बाँट लिये और क्रिया करम नहीं कर रहे हो। मेरी बात सुनकर उनके मुँह फट गये। वे बोले -आप कोन है क्या इनसे परिचित है मगर हमने आपको कभी नहीं देखा है। मैने कहा - मैने भी इनको पहली बार देखा है। वे बोले फिर यह सारी बात क्यों कहा रहे है। यह हमारा बाप है हमारी मर्जी चाहे जैसा करे ।मेने कहा मै दाह संस्कार अधिकारी हूँ और मेरा काम है यह देखना कि लाश का दाह संस्कार ठीक से हुआ की नहीं वरना। वे चौके -वरना क्या ? मैने कहा -वरना इनके मरने का प्रमाणपत्र नहीं मिल पायेगा और इनकी दौलत तुम नहीं ले पाओगे। वे बोले दौलत कैसी दौलत ?बुड्ढा तो कुछ नहीं छोड़ गया। मैने कहा -अच्छा तो तुम ज्यादा चालाक बन रहे हो। मे तो मुर्दो को देखकर ही उनके बारे मे सब कुछ जान जाता हूँ. वे बोले -क्या। बस मै चालू हो गयाऔर मैने मुर्दे की सारी फाइले खोल कर रखा दी। मैने बाते सुनकर वे आश्चर्य मे पढ़ गये और कोने मे जाकर खुसुर पुसुर करने लग गये। मेरे चेहरे पर मुसकान आ गयी समझ गया बकरा फँस गया। थोड़ी देर मे वे पास आकर बोले -साहब गलती हो गयी हमे माफ़ कर दीजिये हम इनका ठीक से क्रिया करम करेंगे। मै समझ गया की मेरी मुर्दो से बात करने की शक्ति काम कर गयी है.। मैने कहा -ठीक से मतलब समझते हो। इनकी अस्थिया गंगा जी मे जानी है इनकी तेरही भी ठीक से होनी है तभी। .वे बोले -साहब बिलकुल ठीक जैसा आपने कहा है वैसा ही करेंगे लेकिन एक बात बताये प्रमाण पात्र तो नगर महा पालिका से मिलता है फिर आपका क्या रोल। मैने कहा -नियम बदल गये है जब तक मै रिपोर्ट नहीं दूंगा तब तक कुछ नहीं हो पायेगा। वे बोले -ठीक है साहब। मैने मुंडी हिला दी। वे बोले -प्रमाणपत्र तो मिल जायेगा ? मैने कहा -क्यों नहीं /वे बोले कोई सेवा हो तो बताइये। मेरा मन प्रसन्न हो गया ।लगा जैसे अपने दफ्तर की सीट पर बैठा हूँ और लोग गिड़गिड़ा रहे है। बस मेरा अनुभव काम आया -मै बोला -भाई अब आपसे क्या बोलू -आप बस पांच लाख दे देना। वे मेरी बात सुनकर एक दूसरे की तरफ देखने लगे। फिर कोने मे जाकर आपस मे बात करने लगे। थोड़ी देर बाद आकर बोले -साहब हम इतना तो नहीं दे सकते बस २ लाख दे सकते है। मैने ज्यादा सोचा नहीं कहा -ठीक है लेकिन यह रकम मुझे जब अस्थिया लेने आओगे तभी चाहिये। वे बोले ठीक है साहब।
वे लोग फिर लकड़ी लेने चले गये तो मुर्दा बोला -सक्सेना साहब शुक्रिया अब मै शांति पूर्वक जल सकूंगा। मैने पूछा -यह पैसे देंगे या दुनिया भर मे पूछताछ करेगे। मुर्दा बोला -सक्सेना साहब आपकी चल चल गयी है। -लालच आदमी को अँधा कर देता है।यह लालची भी है और यह मुर्ख भी है।इन्होने कोन सी कमाई की है.सारा माल तो फ़ोकट मे ही मिल रहा है । मुर्दा शांत हो गया और मै पीपल के नीचे जाकर तमाश देखने लगा। मुरदे की बात सुनकर मेरा भी मन पक्का हो गया कि चाल जरूर सफल होगी।
उस दिन तो समय जैसे तैसे काट लिया लेकिन बाकी दिन कैसे कटे यह मै ही जानता हूँ ।
तीसरे दिन मै कुछ ज्यादा जल्दी ही शमशान पहुंच गया। मुर्दे आना शुरू हो चुके थे लेकिन आज मै मुर्दो को नहीं जिन्दा आदमी की तलाश मे था। दोपहर हो चुकी थी और वे अभी तक नहीं आये थे। मेरा दिल धक् धक् करने लगा। लगता है मुर्दे ने और उसके लडको ने मुझे अच्छा मुर्ख बना दिया । लच का टाइम हो चूका था। सारे हिस्सेदार एकत्र हो चुके थे लेकिन मुझे भूख नहीं लग रही थी। मेरा सारा ध्यान तो लाल लाल नोटों पर था। पापी मन कह रहा था की ऐसा नहीं हो सकता कि शिकार पंजे से निकल जाये। लेकिन सच्चाई यही थी की अब दिन ढलने की तैयारी मे था और शिकार का अता पता नहीं था। मेरा मन भी उदासी की और चलने लगा और हिस्सेदार भी शोर मचाने लगे। तभी अचानक मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। मैने देखा की वे चारो शमशान घाट मे आ चुके थे और एक काली पॉलथिन लिये हुए मेरी और चले आ रहे थे। मेरी ताडू आँखों ने फ़ौरन पहचान लिया की काम हो चूका है।वे मेरे सामने थे और हाथ जोड़कर कह रहे थे - -साहब पूरे है चाहे तो गिन लो। मैने पॉलीथिन ले ली। अनुभवी आँखों ने तोल लिया और मैने लपक कर अपना थैला उतार लिया और कहा इसकी कोई जरुरत नहीं । वे लोग तो अपने कर्म मे लग गये और मैने अपना सारा टिफिन अपने हिस्सेदारों को बाँट दिया। वे भी बड़े खुश हो गये और मै काली पोलेथिन को थैले मे रखते हुए सोच रहा था की अब मुझे यहाँ से फ़ौरन चल देना चाहिये और हाँ यह भी सोचा लिया की आज तो चौराहे पर कल्लू हलवाई के यहाँ जी भर के गरम समोसे खाऊंगा।

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