पहलवान के किस्से -चचे सलाम....

गप शप की पूरी तेयारी थी .पहलवान आ चुके थे छंगू  बाबू ने कुर्सी पकड़ ली थी और में पूरी तरह से तैयार बेठा था .तभी किसी ने मुझे आवाज लगायी –चचा सलाम .मेने चोंक कर देखा .दरवाजे पर एक नोजवान खडा था जो समय से पहले ही उम्र दराज लगाने लगा था .उसकी दाढ़ी मुंछ  और बाल बेतरतीब से बढे हुए थे और वो पूरी तरह  से लापरवाह लग रहा था .उसकी आवाज तो कुछ पहचानी सी लगी मगर याद नहीं आरहा था .मुझे असमंजस में पडा देख उसने फिर कहा –चचा पहचानो नाही .अब में पहचान गया .अरे डमरू तू .उसने कहा –चचा ठीक पहचाना में तुम्हारा डमरू ही हूँ .मेने कहा –मगर यह तुम्हारा हाल तुम तो बड़े होशियार और गबरू जवान थे .डमरू बोला –चाचा क्या बताऊँ सब अपनी किस्मत और देश की व्यवस्था हे.मेने अचकचा के पूछा –क्या बात हो गयी जो देश की व्यवस्था का रोना रो रहे हो .डमरू बोला –चचा बेरोजगार हूँ पिछले  चार पांच साल से हाथ पैर मार रहा हूँ नोकरि नहीं लगी .मुझे आश्चर्य हुआ मेने कहा –तुम  तो पढाई में होशियार थे हमेशा  टॉप करते थे .बुध्धू  बता रहा था की तुम्हारा इंजीनियरिग में सलेक्शन हो गया था . डमरू बोला –हाँ चाचा सही कह रहा था .सोचा था इंजीनियरिग करके सरकारी नोकरि पाउँगा शादी करूँगा और मजे की जिंदगी जिऊँगा .मगर सब सपने देश की व्यवस्था में स्वाहा हो गए  छंगू  बाबु बोले क्यों इंजीनियरिग नहीं कर पाए .पहलवान बोला –हमने तो सूना था कि इंजीनियरिग की काफी डिमांड हे ,फिर केसे रहा गए .डमरू बोला – मेने इंजीनियरिग भी टॉप  किया था .तमाम कंपटीशन  भी क्रेक किये .पचीस इंटरव्यू भी दिए मगर नतीजा कुछ नहीं .हर जगह या तो  आरक्षण वाले ले गए या फिर  जुगाड़ वाले .में तो  रह गया  छंगू  बाबु बोले –यह तो सही हे अब देखो सरकारी नोकरी में पचास परसेंट तो आरक्षण हे .तीस परसेंत जुगाड़ वालो की और बची कुची दलालों की .अब टापरो के लिए कहाँ जगह बची. पहलवान बोला –यह देश की व्यवस्था हे जहाँ टापर की भी  नोकरी  की गारंटी नहीं होती  या तो वे सरकार में कांट्रेक्ट पर भर्ती होकर शोषण अत्त्याचार का शिकार होते हे या फिर प्राइवेट सेक्टर में जा कर अपने सपनों का नाश करते हे ..यहाँ भी उनका कम शोषण नहीं होता हे .डमरू चालू हो गया .वो ना जाने क्या क्या कहता जा रहा था .मामला गंभीर होता जा रहा था तो मेने इसे हलका करने के लिए कहा –तो फिर दूसरी नोकरी लिए प्रयास नही किया .डमरू बोला –क्यों नहीं चचा .मेरे इस चक्कर में तीन साल निकल गए गाँठ  के पेसे निकल रहे थे .तब  मेने सोचा की चलो मास्टर  ही बन जाऊ .मित्रो की सलाह पर शिक्षा मित्र बन  गया .मित्रो  ने कहा –अभी तो तनख्वाह कम हे मगर सरकार बहुत जल्दी मास्टर बना देगी .मेने इसके चक्कर में बीएड भी कर ली .बाद में सरकार पलट गयी –कहा टी जी टी करना होगा तभी मास्टर बन पाओगे .चचा मेने लग कर टी जी टी भी कर ली और मेरा सलेक्शन भी हो गया .पहलवान बोला –वेरी गुड .डमरू बोला –चचा किस्मत यहाँ भी खोटी निकली देश की सुव्यवस्था यहाँ भी काम कर गयी .किसी ने पारदर्शिता को लेकर कोर्ट में गुहार लगा दी और मामला कोर्ट में अटक गया छंगू  बाबू  बोले –अरे ...मेने पूछा तो फेसला नहीं आया .डमरू बोला –हमारे देश की कानून व्यवस्था में न्याय चींटी की चल चलता हे .पिछले  दो साल से प्रतीक्षा कर रहा हूँ मगर अब उम्मीद धूमिल हो गयी ,गाँठ  के सारे  पेसे भी ख़तम हो गए और भुखमरी  की नोबत आ गयी .पहलवान बोला –कितनी बुरी बात हे हिन्दुस्तान के पढे लिखे नोजवानो की यह हालत .मेने कहा -तो तुम्हारी इस हालत की यह हे कहानी .डमरू बोला –चाचा अभी कहानी कहाँ ख़तम हुई हे .उसने कहना शरू किया .चाचा नोकरी  मिली नहीं शादी हुई नहीं सपने सब टूट गए पास में पेसे नहीं सोचने लगा की क्या करू अब तो बस पेट भरने की बात ही रह गयी थी .तभी मेने टीवी पर अपने देश के चोकीदार का भाषण सूना .वे कह रहे थे –जो लोग स्टेट बेंक के पास पकोड़ा बना कर बेचते हे और रोजाना शाम को २०० रु कमा कर ले जाते हे क्या वो रोजगार नहीं हे. सुनकर मेरा माथा खटका. फिर हमारे मित्र शेलेश ने भी कहा –पकोड़ा बनाकर इमानदारी से २०० रुपये कमाना बहुत सम्मान की बात हे . . मेने उसी समय तय कर लिया कि अब में भी स्टेट बेंक के नीचे पकोड़े की ठेल लगाऊंगा.फिर किराये का सामान लेकर मेने पकोड़े की ठेल लगा ही ली .पहलवान बोला –बिना ट्रेनिग लिए .डमरू बोला –चाचा बचपन में अम्मा से सिखा था .अकसर बनाया करता था अम्मा कमी बताया कराती और केसे स्वाद बढाया जाये ये भी बताती थी. सो यह विद्या तो घर सीखी हुई थी .काम आ गई .मेने उत्सुकता से पूछा तो फिर ......डमरू बोला –तो फिर क्या हम पकोड़े बनाबे लगे .दिन भर में २००रुपये कमा लेता था मगर पल्ले १०० रुपये ही पड़ते .छंगू बाबु बोले .-वो केसे .डमरू बोला ५० तो थाने वाले ही ले जाते और बाकि ५० चुंगी वाले  इंस्पेक्टर और दबंग टाईप के लोग .पहलवान बोला –यह तो होना ही था .मेने कहा –तो फिर  काम चल निकला की नहीं .शादी वादी हुई की नहीं /डमरू बोला –अरे कहा चचा –लड़की वाले आते और पुछते –क्या करते हो .में बड़े ही गर्व से कहता –मेरा पकोड़ा बनाने का बिजनिस हे .वे सुनकेर मुह बिचकाते और कहते –पकोड़े की ठेल लगते हो .ये भी कोई काम धंधा हे .में सीना तान के कहता –हमारे देश के प्रधान सेवक भी तो चाय बेचते थे और देखो कितने बड़े आदमी हो गए .में भी पकोड़े बेचकर क्या बड़ा आदमी नहीं हो सकता हूँ .वे मेरी बात पर हंसते बोलते –उन्होंने तो बड़े आदमी के चक्कर में अपनी शादी छोड़ दी क्या तुम भी एसा करोगे .चचा मेरे पास इस तर्क का जवाब नहीं था. चलते चलते वे एक सलाह जरुर दे जाते शादी करनी हे तो कोई काम का धंधा  करो ..डमरू बोला –उनकी ये बाते सुन सुन कर मेरा दिल टूट गया और आज आखिरी बार पकोडे बना कर मेने यह काम बंद कर दिया और आपके पास चला आया .. उसने अपनी कहानी सुनाकर एक लम्बी साँस ली और अपनी बात को विराम दे दिया . छंगू  बाबु बोले –तो अब क्या इरादा हे .डमरू ने इसका कोई जवाब नहीं दिया और मुझसे बोला –चचा बहुत भूख लग रही हे .पहले कुछ खाया जाए तब आगे की सोचे .मेने कहा –क्या खाओगे .डमरू बोला –चाचा मेरे पास बचे हुए पकोड़े हे बस आप चची से कह कर चाय बनवा दों .मेने कहा ठीक हे .मेने मेडम को सन्देश दिया कुछ खाली  प्लेट और चाय भिजवादो .थोड़ी ही देर में छुट्टन खाली प्लेट और चाय ले आया  .डमरू ने प्लेटो में पकोड़े रख दिए और बोला –खाइए और बताइए केसे बने हे  .हम लोगो ने पकोड़े खाने शुरू किये .सचमुच बहुत  स्वादिष्ट बने थे  अभी अभी भी गर्म  थे और साथ बनी चटनी का तो कोई जवाब नहीं था .हम लोगों को पकोड़े तो पसंद ही थे ऊपर से कई दिनों बाद खा रहे थे .छंगू बाबु बोले –भाई डमरू पकोड़े तो बहुत स्वादिष्ट बने हे मजा आ गया .मेने भी सुर में सुर मिलाया .पहलवान तो खाने में ही लगा रहा मगर मुंडी हिलाकर उसने भी तारीफ़ कर दी .डमरू पर तारीफ़ का कोई असर दिखा नहीं बस थोडा मुसुकुरा कर रह गया .पकोड़े खाकर मन तृप्त हुआ तो चाय पीते पीते मेने कहा –तो अब क्या इरादा हे .डमरू ने कहा –कुछ  नहीं चचा सोच रहा हूँ हरिद्वार चला जाऊं वहां किसी बाबा का चेला बन कर मुफ्त की रोटी तोडू. मेने कहा –यानी बाबा बनोगे .मतलब ये शादी वादी की बात ख़तम .मेरी बात पर डमरू हंसा .चचा में बाबा बनने नहीं बाबागिरी का धंधा करने की सोच रहा हु .आजकल ये धन्धा बहुत चल रहा हे . देखते नहीं कि बाबागिरी कितनी पोपुलर हे .डमरू अपनी ही बातो में डूब गया .में कुछ  कहना चाहता था मगर डमरू की आँखों में बाबागिरी  के सपनों को देखते हुए चुप रहा गया वो अपने ही सपनों में खोया हुआ था. मेने धीरे से यह जरुर कहा – मेहनत  और भाग्य से बाबा रामदेव बनते देर नहीं लगती .मुझे नहीं मालुम उसने सूना या नहीं लेकिन मेने देखा उसकी आँखे किसी ख्याल में डूबी हुई थी शायद किसी सपने में  खोया हुआ था .छंगू  बाबु आराम से पैर पसार  कर बेठे थे तो पहलवान बचे  कुछे पकोडो को साफ़ करने मे लगा हुआ था और मेँ देश के नोजवानो की बेरोजगारी और भ्रष्टाचार  को लेकर चितिंत हो रहा था

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